गुरुवार, 26 सितंबर 2024

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और लता मंगेशकर के संयोग से बने मधुर मोहक कैबरे गीत।

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और लता मंगेशकर के संयोग से बने मधुर मोहक कैबरे गीत।


लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ट्रेंड सेटर थे और उनकी प्रतिभा को लता मंगेशकर ने पचास के दशक की शुरुआत में मंगेशकर परिवार द्वारा संचालित एक अकादमी सुरीला कला केंद्र में पहचाना था।

लता मंगेशकर और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने 712 गानों पर साथ मिलकर दुनिया की सबसे बेहतरीन और बहुमुखी संगीतकार-गायक टीम बनाई है।यह एक ऐसी टीम है जो  कैबरे में भी सुर और मिठास पैदा कर सकते हैं

लता मंगेशकर और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का रिश्ता हिंदी सिनेमा में किसी भी संगीतकार और किसी भी गायक के बीच लंबे समय तक, बड़े, करीबी और अधिक पुरस्कृत करने वाला था।

कुछ चुने हुए कैबरे गाने, जीनमे लता मंगेशकर और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल सुर और मिठास पैदा कर दी 


ओ दिलवालो साज़-ए-दिल... “लूटेरा” १९६५। .. गीतकार आनंद बक्शी 

एक खूबसूरत गानों का ‘एल्बम’. लता मंगेशकर ने छह एकल गीत गाए हैं। लुटेरा के सभी गीतों में अलग-अलग शैली का composition  है। हर गीत की लय (Rhythm) अलग है। गानों में गजल, चालू गीत, पश्चिमी, शास्त्रीय / अरेबियन लोकगीत और कैबरे हैं। गीतों में मधुरता और विविधता बहुत है। गाने आनंद बक्शी और असद भोपाली द्वारा लिखे गए हैं।

अभिनेत्री बेला बोस ने बिलेंडर जहाज पर एक शानदार गीत और नृत्य के साथ समुद्री डाकुओं का मनोरंजन करते हुए। लता मंगेशकर द्वारा खूबसूरती से गाया गया। अरबी लोक धुन पर आधारित... वायलिन, brass के वाद्ययंत्र, ध्वनिक गिटार (अकॉस्टिक गिटार) और लता जी के पस्चिमी शैली के 'आलाप' के साथ ४६ सेकण्ड्स का 'प्रील्यूड' श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता है। गीत की दूसरी विशेषता यह है, दोनों 'अंतरो' के साथ-साथ 'मुखडे’' में लता जी की आवाज को पुरुष कोरस और बांसुरी का  surround sound effect (चारो और से ध्वनि).  दोनों 'अंतरा' के साथ-साथ 'मुखड़ा' में... ऑर्केस्ट्रा की सजावट बेहतरीन है, विशेष रूप से बांसुरी, एकल वायलिन, ध्वनिक गिटार, ताली और लय में बोंगो ड्रम का उपयोग। यह गाना डांसर बेला बोस और दारासींग पर  फिल्माया  है. 



 


मेरा नाम है जमीला... “नाइट इन लंडन”   १९६७। .. गीतकार आनंद बक्शी 


जमीला ssssssss:: जमीला sssssssला::जमीला:: 

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इस गाने में लता मंगेशकर से  "जमीला" शब्द को नौ अलग-अलग तरीके से गवाया है. ६५ सेकण्ड्स का प्रील्यूड में लताजी ने अपने वेस्टर्न स्टाइल “आलाप” को विशाल ऑर्केस्ट्रा के साथ खूबसूरत तरीके से synchronize किया है.  हेलेन ने इस कैबरे गान में  अपना शानदार  नृत्य पेश किया है. तीनों "इंटरल्यूड्स" में अलग-अलग धुनें हैं। पूरे गाने में ब्रास इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल ऑर्केस्ट्रा है. गाने में  बोंगो ड्रम्स की तेज rhythm  है. ऑर्केस्ट्रा के बीच में इलेक्ट्रिक गिटार का भी इस्तेमाल किया गया है। गाने की एक और खूबसूरती यह है कि लता मंगेशकर का मधुर ‘स्वर’ सभी ‘अंतरों’ में पुरुष कोरस से घिरा  हुआ है। 




आ जान-ए-जान... “इंतकाम”  १९६८  गीतकार: राजिन्दर किशन 


हिंदी फिल्म संगीत में सबसे बेहतरीन कैबरे गानों में से एक। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का भारी और समृद्ध ऑर्केस्ट्रेशन, लता मंगेशकर की बेहद कोमल प्रस्तुति, हेलेन की लचीली चाल और पी.एल. राज द्वारा बेहतरीन कोरियोग्राफी। 


70 सेकंड का “प्रील्यूड” भारी brass इंस्ट्रूमेंट्स, सैक्सोफोन और ट्रम्पेट जैसे  संगीत वाद्ययंत्रों से भरा हुआ है, जो  मंत्रमुग्ध कर देने वाला है। लताजी द्वारा शानदार शुरुआत.. ‘आ जाने जां’ के बाद 3 सेकंड का ‘pause’ जो कानको भाने वाला है ये “पॉज” श्रोताओं को इस  गीत के लिए ऑर्केस्ट्रेटेड की गयी ‘सुमधुर’ rhythm  पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर करता है। सुनिए कि लताजी ने कितनी खूबसूरती से ‘आ लाला लाला लाला’ गाया है जो ‘कातिलाना’ है। कोई भी दूसरा गायक उस भाव में इतनी खूबसूरती नहीं ला सकता था। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इस कैबरे को असाधारण तरीके से तैयार किया है, जिसमें ब्रास, ट्रम्पेट, सैक्सोफोन, क्लैरिनेट, गिटार और जैज़ फ्लूट का अधिकतम उपयोग किया गया है. भव्य ऑर्केस्ट्रा, कैबरे गाना होने के बावजूद, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और लता मंगेशकर ने इस गाने की मेलडी को बरक़रार रखा  है. हेलेन जी का डांस बहुत ही सुंदर लग रहा है, अश्लीलता से बिल्कुल दूर। यह गाना चार्ट पर तुरंत हिट हो गया और आज भी लोकप्रिय है।




महफ़िल सोई ऐसा कोई... “इंतकाम”  १९६८  गीतकार: राजिन्दर किशन 

"हेलेन-लता-एलपी" का  एक और मधुर कैबरे गीत। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इस western style गीत को jazz  बांसुरी, acoustic गिटार और वायलिन के बेहतरीन और अधिकतम उपयोग के साथ सुंदर बोंगो ड्रम 'ताल' के साथ संगीतबद्ध किया है। एक बार फिर हेलेन द्वारा शानदार कैबरे, आधुनिक नर्तकियों के लिए एक सबक। इस गाने के एक और खासियत, यह गीत दोनों अन्तरा के अंत में ऐसा लगता है के गाना ख़तम हुआ. गाना सर्वश्रेष्ठ होने के बावजूद, कम महत्व रखता है क्योंकि दूसरा कैबरे ('आ जाने जान') उसी फिल्म, "इंतक़ाम" से अधिक बजता है और लोकप्रिय भी है.




दर्द-ए-दिल बढ़ता जाए   “बुनियाद”  १९७१  गीतकार आनंद बक्शी 

अभिनेत्री बिन्दु संगीतकार लक्ष्मीकांत की सालीजी को  (sister in law ) हमेशा अपने  बहनोइसे शिकायत रेहती थी की लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल नृत्यांगना हेलेन के लिए  अच्छे गाने देते है. इस शिकायत को दूर करने के लिए लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने ये गाना बनाया.  

एक khaas गाना है, इसलिए की  केबरे song को ढोलक की rhythm. यह है कि वे विभिन्न प्रकार की संगीत शैलियों और वाद्ययंत्रों के प्रति उल्लेखनीय खुलेपन से भरे हैं। गिटार, jazz बांसुरी, ढोलक की जोरदार rhythm, के साथ शास्त्रीय रागों का मिश्रण। इस मधुर ऑर्केस्ट्रा मे बांस की बांसुरी और गिटार जैसे पश्चिमी वाद्ययंत्रों को लता की मधुर आवाज़ के साथ कितनी शानदार ढंग से सिंक्रोनाइज किया है। तीनों इंटरल्यूड्स की धुनें अलग-अलग हैं। साठ और सत्तर के दशक में लता और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने भारतीय फिल्म उद्योग को कुछ सबसे मधुर गीत दिए हैं और यह उनमें से एक है। यह लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए लता द्वारा गाया गया सबसे मधुर कैबरे गीत है। अभिनेत्री बिंदु पर फिल्माया गया।




अजय पौंडरिक 

वडोदरा 





1 टिप्पणियाँ:

यहां 26 सितंबर 2024 को 8:28 am बजे, Blogger Rakesh sadeo ने कहा…

Superb post by Ajay ji ❤️🙏

 

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